खर्चीली शादियों
विवाह (शादि) एक मनोरंजन के रूप में होता है उसमें ढेरों पैसे इस प्रकार बर्बाद होता है जिसकी दोनों पक्षों में से किसी के लिए कोई उपयोगिता नहीं है बारात का चढ़ाना, लंबी चौड़ी दावत, वर-वधू के लिए महंगे कपड़े बनाना जो बाद में शायद ही कभी काम में आते हैं बैंड बाजा आतिशबाजी आदि खर्चे का हिसाब जाए तो यह एक ऐसी बर्बादी हैं जिसमें ढेरों पैसा उड़ जाता है और उसकी ऐसी परिणति तनिक भी नहीं होती जिसे समझदारी कहा जा सके महंगी शादियों में कुल मिलाकर दोनों और का जो पैसा खर्च होता है उसमें एक प्रकार से दिवालिया होने की नौबत आ जाती हैं।
खर्चीली शादियों में 3 दिन के धूमधाम के उपरांत जिंदगी भर के लिए ऐसी गरीबी सिर पर लद जाती हैं जिसके कारण परिवार की शिक्षा, तंदुरुस्ती, प्रगति के सभी द्वार बंद हो जाते हैं इसके उपरांत गरीबों को अमीरों का स्वांग करना पड़ता है गरीब इस महंगाई के जमाने में मुश्किल से अपने परिवार का गुजारा कर पाते हैं गरीब अपनी परिवार के बच्चों की शादी के लिए पेट काटकर, कर्जा लेकर, घर के बर्तन बेचकर अथवा बेईमानी बदमाशी पर उतारू होकर भी शादी का इंतजाम करते हैं उस परिवार की चैन कोसों दूर हो जाती हैं और बहू बेटी जो शादी कर कर घर पर आती है वह हर समय ताना सुनती रहती है कि तुम्हारे घर आने पर हमारे ऊपर इतना कर्जा हो गया और उस पर दहेज के लिए दबाव डालते हैं। आखिरकार वह शादी एक झगड़े या मौत का रूप ले लेती है।
शादियों में प्रचलित वर्तमान परंपरा का त्याग:-
शादी में व्यर्थ का खर्चा त्यागना पड़ेगा जैसे बेटी की विवाह में बड़ी बरात का आना, दहेज देना, डी. जे. बजाना, नाचना गाना यह व्यर्थ परंपरा है जिस कारण से बेटी परिवार पर भार मानी जाने लगी हैं और उसको गर्भ में ही मारने का सिलसिला शुरू हैं जो माता-पिता के लिए महापाप का कारण बनता है ऐसे देखा जाए तो तीनों देवताओं की जब विवाह (शादियां) हुई थी उस समय नहीं बराती था ना कोई भाती था ना कोई भोजन भंडारा किया गया था ना डी. जे. बजा था विवाह शादी करने का उदेश्य संतानोंत्पति करना है इसके लिए इतने बड़े खर्चे की कोई आवश्यकता नहीं है जो दोनों परिवारों पर बोझ बढ़ जाए संत रामपाल जी महाराज जी के तत्व ज्ञान के आधार पर उनके अनुयाई 17 मिनट में बिना खर्चे की विवाह (शादियां) करते हैं जिसमें दोनों परिवार सुखी जीवन जी कर परमात्मा की भक्ति करते हैं।
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